प्रासुक नीर, सूक्ष्म जीव रक्षा (अपकायिक जीव), प्रामाणिक जीवनी प्रक्रिया एवं अणुव्रत नैतिक आचरण के संवर्धन हेतु समर्पित एक पंजीकृत धार्मिक व कल्याणकारी संस्था।
PRASUK NEER ANUVRAT TRUST उत्तर प्रदेश में पंजीकृत एक निष्काम धार्मिक एवं सामाजिक संस्था है। हमारे ट्रस्ट की स्थापना का मुख्य उद्देश्य जैन धर्म के मूल स्तम्भ 'अहिंसा परमो धर्मः' को केवल विचारों तक सीमित न रखकर उसे दैनिक जीवन के आचरण में उतारना है।
हमारे पूज्य तीर्थंकरों एवं आचार्यों ने स्पष्ट निर्देश दिया है कि अनछने पानी में अनगिनत सूक्ष्म जीव होते हैं। बिना छाने जल का उपयोग करने से हम अनजाने में ही जीव हिंसा के प्रथम महापाप के भागीदार बनते हैं। हमारा ट्रस्ट घर-घर तक सफेद दोहरे सूती छन्ने से छनाई, प्रामाणिक जीवनी की विधि एवं त्रि-स्तरीय काल मर्यादा का बोध कराने हेतु समर्पित है।
अर्थात् — संसार के सभी सूक्ष्म-स्थूल जीव जीना चाहते हैं, कोई मरना नहीं चाहता। अतः जल के सूक्ष्म जीवों की रक्षा करना प्रत्येक विचारशील मनुष्य का परम धर्म है।
प्रत्येक जैन श्रावक के मूल आचरण का पालन:
प्रत्येक जैन एवं जैनेतर परिवार तक जल छानने का छन्ना पहुँचाना ताकि हर घर में छना हुआ जल ही प्रयोग में आए।
जल छानने के पश्चात छन्ने में आए त्रस जीवों की उसी जल के द्वारा रक्षा कर उन्हें पुनः सुरक्षित जलाशय या जल-स्रोत में पहुँचाना।
अनछने नीर के उपयोग में हिंसा नामक प्रथम पाप माना जाता है। इस हिंसा से साधर्मियों और समाज को बचाना हमारा सर्वोच्च ध्येय है।
इन उद्देश्यों को केंद्र में रखकर हमारी संपूर्ण संस्था कार्य कर रही है:
जैन आगमों के अनुसार एक बूंद अनछने नीर में इतने जीव होते हैं कि अगर उन्हें कबूतर के बराबर बड़ा किया जाए तो एक लाख योजन का पूरा जम्बूद्वीप भर जाए। इन जीवों को हिंसा से बचाना हमारा प्रथम उद्देश्य है।
जैनाचार्यों द्वारा प्रतिपादित असंख्य जीवों की उपस्थिति और आधुनिक विज्ञान द्वारा प्रमाणित 36,450 जीवों की उपस्थिति के सत्य को आधुनिक पीढ़ी के समक्ष वैज्ञानिक तथ्यों के साथ प्रस्तुत करना।
जैन धर्म के नियमानुसार सूती सफेद मोटे दोहरे छन्ने (जिसमें सूर्य की किरण प्रवेश न कर सके) का उपयोग जन-जन तक पहुँचाना और घरों में सही छन्ने का प्रयोग सुनिश्चित करना।
छने हुए नीर से छन्ने को चारों तरफ अंदर-बाहर पानी डालकर बहते हुए नीर में बहाना जीवनी कहलाती है। इस प्रक्रिया का प्रत्यक्ष प्रशिक्षण शिविरों व वीडियो के माध्यम से देना।
छानने पर 48 मिनट, स्वाद/रंग बदलने व गर्म करने पर 6 घंटे, और पूर्ण उबालने पर 24 घंटे की मर्यादा का ज्ञान कराकर बासी जल के दोषों से रक्षा करना।
अहिंसा, सत्य, अचौर्य, सात्विक चौविहार आहार, एवं पर्यावरण शुद्धि के अणुव्रतों को समाज के हर वर्ग तक ले जाकर एक स्वस्थ व तनाव-मुक्त समाज का निर्माण करना।
नीर छान कर क्यों पिया जाता है? आगम और विज्ञान दोनों के आलोक में इसका संपूर्ण रहस्य समझिए।
भगवान महावीर स्वामी और पूज्य जैनाचार्यों ने ज्ञान के उच्चतम शिखर केवलज्ञान द्वारा यह उद्घाटित किया कि जल केवल एक भौतिक तरल नहीं, अपितु जीवों का एक विशाल समुदाय है जिसे 'अपकाय' कहा जाता है।
एक बूंद में असंख्य जीव होते हैं। जब कोई व्यक्ति बिना छाने पानी पीता है, तो उसके उदर में पहुँचकर या अग्नि पर पकने से उन सभी जीवों की अत्यंत पीड़ादायक मृत्यु होती है। इसी कारण जैन आचार-शास्त्रों में अनछने पानी के उपभोग को हिंसा नामक प्रथम पाप कहा गया है।
आज आधुनिक जीव-विज्ञान (Microbiology) भी जैन धर्म के इस शाश्वत सत्य को शत-प्रतिशत प्रमाणित करता है। माइक्रोस्कोप के नीचे जब एक बूंद कच्चे पानी का परीक्षण किया जाता है, तो वैज्ञानिकों ने 36,450 गतिशील सूक्ष्म जीवों (Bacteria, Amoeba, Paramecium, Micro-organisms) की पुष्टि की है।
अनछना पानी न केवल आध्यात्मिक दृष्टि से हिंसा का कारण बनता है, बल्कि शारीरिक दृष्टि से भी टाइफाइड, पेचिश, हैजा, और पेट के संक्रमण जैसे गंभीर रोगों का मुख्य स्रोत है।
चित्र में प्रत्यक्ष रूप से 'प्रासुक मर्यादित नीर' का मूल दोहरा सूती छन्ना वस्त्र एवं उसकी आगम-सम्मत छनाई विधि प्रदर्शित है। मोटा सूती वस्त्र सूर्य की किरणों को भी रोक देता है, जिससे जलकायी जीवों की पूर्ण सुरक्षा सुनिश्चित होती है।
जैन आगमों में वर्णित दोहरे सूती छन्ने की पद्धति केवल एक धार्मिक आस्था नहीं, अपितु वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित जल-शोधन प्रक्रिया है।
पारंपरिक दोहरे छन्ने की शुद्धिकरण क्षमता को मानक BIS प्रमाणित प्रयोगशालाओं (BIS Certified Labs - ETS Lab) द्वारा वैज्ञानिक रूप से परीक्षण कराकर प्रमाणित कराया गया है। माइक्रोबायोलॉजी विश्लेषण में जल की शुद्धता एवं सुरक्षा की आधिकारिक पुष्टि हुई है।
आधुनिक उन्नत जल शोधन तकनीकों जैसे कंगन वॉटर (Kangen Water), आर.ओ. एवं बोतलबंद पानी के समानांतर छने हुए प्रासुक जल का pH स्तर, प्राकृतिक खनिज संतुलन और प्रभावशीलता का प्रत्यक्ष परीक्षण संपन्न किया गया।
| हिन्दी (Hindi Agam Vidhan) | English (Scriptural & Scientific Synthesis) |
|---|---|
| नीर छान कर क्यों पिया जाता है ? | Why is water filtered before drinking? |
| एक बूंद अनछने नीर में इतने जीव होते हैं अगर उन्हें कबूतर के बराबर बड़ा किया जाए तो पूरा एक लाख योजन प्रमाण पूरा जम्बूद्वीप भर जाए। | In a single drop of unfiltered water, there are so many living beings that if they were enlarged to the size of a pigeon, the entire Jambudvipa measuring one lakh yojanas would be completely filled. |
| जैनाचार्यों ने एक बूंद अनछने नीर में असंख्य जीव और वैज्ञानिकों ने 36,450 जीवों की उपस्थिति की पुष्टि की है। | Jain Acharyas have confirmed the presence of countless living beings in a single drop of unfiltered water, and scientists have confirmed the presence of 36,450 organisms. |
| अनछने नीर के उपयोग में हिंसा नामक प्रथम पाप माना जाता है। | The use of unfiltered water is considered the first sin, named violence (himsa). |
| जैन धर्म में सूती सफेद मोटे दोहरे छन्ने से जिसमें सूर्य की किरण प्रवेश को प्राप्त न हो ऐसे छानकर नीर को प्रासुक किया जाता है। | In Jainism, water is made 'prasuk' (purified/restrained) by filtering it through a thick, double-layered white cotton cloth through which sunbeams cannot penetrate. |
| छने हुए नीर के द्वारा छन्ने को चारों तरफ अंदर बाहर नीर डालना और उस पानी को बहते हुए नीर में बहा देना, जीवनी कहलाती है जिससे जीवों की रक्षा होती है। | Pouring water inside and outside all around the filter cloth with filtered water and letting that water flow back into running water is called 'Jeevani', which protects the living organisms. |
| साधारण छना जल (मर्यादा): दोहरा सूती छन्ना लगाकर जल छानने पर उसकी मर्यादा 48 मिनट (1 अंतर्मुहूर्त) रहती है। |
Plain Filtered Water Validity: Upon filtering through a double cotton cloth, its validity is 48 minutes (1 Antarmuhurat). |
| 48 मिनट के भीतर मर्यादित करने के नियम: • 6 घंटे की मर्यादा: जल में लौंग, सौंफ, मिश्री आदि डालकर स्वाद या रंग बदलने पर, अथवा जल को हल्का गुनगुना (प्रासुक) करने पर। • 24 घंटे की मर्यादा: जल को पूर्णतः अच्छी तरह उबालने (खौलने) पर। |
Rules to extend validity within 48 minutes: • 6 Hours: By adding cloves, fennel, rock sugar (mishri) to alter taste/color, or mildly warming (making prasuk). • 24 Hours: By boiling the water thoroughly (vigorous boiling). |
इस पावन वीडियो में हमारे ट्रस्ट के संपूर्ण उद्देश्य और नीर को छानकर पीने योग्य बनाने की व्यावहारिक विधि समझाई गई है।
हमारे ट्रस्ट द्वारा आयोजित किए जाने वाले पावन सम्मेलनों में सम्मिलित होकर प्रासुक नीर, सात्विक चौविहार आहार, एवं संत प्रवचनों का आध्यात्मिक लाभ प्राप्त करें।